जनता का दर्द सुनेंगे पर कंपनी का ही भला होगा! - दा त्रिकाल

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Friday, January 19, 2024

जनता का दर्द सुनेंगे पर कंपनी का ही भला होगा!

बिजली के दाम और जनसुनवाई का ड्रामा, उपभोक्ता की जेब में डाके की तैयारी पूरी

मध्यप्रदेश में बिजली के दामों का बढ़ना तय हो चुका है, जिन उपभोक्ताओं को लगता है कि विद्युत नियामक आयोग की सुनवाई में जनता को राहत मिलेगी तो वे ये खयाल दिल से निकाल दें। जब से ये सुनवाई का ड्रामा शुरु हुआ है, आज तक जनता को राहत नहीं मिली है, सदैव कंपनियों की ही सुनी गई है। अब एक बार फिर से वही सब दोहराया जा रहा है। बिजली के दाम बढ़ाये जाने का प्रस्ताव पेश किया जा चुका है। आयोग वैसे तो जनता का दर्द सुनेगा पर अंतत: कंपनी का ही भला होगा।

-कुछ ऐसा है प्रपोजल
कंपनी 3.86 प्रतिशत बिजली का दाम बढ़ाना चाहती है। 29 जनवरी को जबलपुर, 30 को इंदौर और 31 को भोपाल में जनसुनवाई होगी। इस पर मप्र विद्युत नियामक आयोग जनसुनवाई करेगा। जनसुनवाई ऑनलाइन होगी। आमतौर पर एक आपत्ति और सुझाव आते हैं, हंगामा होता है और दाम बढ़ जाते हैं। दामों की वृद्धि से दो करोड़ बिजली उपभोक्ताओं के जीवन पर सीधा फर्क पड़ेगा। वर्तमान में ऑनलाइन जनसुनवाई होने से आपत्तिकर्ता इस प्रक्रिया को खानापूर्ति मानते हैं और इसके लिए कारण भी गिनाए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि कोरोना के बाद से ऑनलाइन जनसुनवाई की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। समय के साथ हालात अब सामान्य हो चुके हैं, लेकिन मप्र विद्युत नियामक आयोग की जनसुनवाई आनलाइन मोड में ही जारी है।

-सुनवाई के मायने
वहीं बिजली मामलों के जानकारों ने कहा कि बिजली दरें बढ़ाने की सुनवाई कई वर्षों से सिर्फ औपचारिकता रह गई है। प्रत्यक्ष व्यवस्था के जरिए सुनवाई होनी चाहिए। वर्ष 2000 में जब जस्टिस शचींद्र द्विवेदी विद्युत नियामक आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे, उन्होंने जनसुनवाई प्रारंभ करवाई थी। 2020 में कोरोना संक्रमण के बाद से आनलाइन जनसुनवाई का दौर प्रारंभ हो गया। पूर्व क्षेत्र कंपनी में अभी तक पांच आपत्ति आई है। 2046 करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई के लिए बिजली कंपनी ने अगले वित्तीय वर्ष में बिजली दरों में 3.86 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा है। इस पर आपत्ति बुलाने के लिए विद्युत नियामक आयोग ने 21 जनवरी आखिरी तारीख तय की है। भोपाल में आनलाइन सुनवाई 31 जनवरी को होगी। इस आपत्ति और सुनवाई को लेकर शहर के ज्यादातर उपभोक्ता रुचि नहीं लेते। हालत यह है कि हर साल औसतन सिर्फ 20 उपभोक्ता ही आपत्ति दर्ज कराते हैं।

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