Written By : Matloob Ansari
राम मंदिर मसले पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के तेवर सख्त
रामालय ट्रस्ट को क्यों भूल गए। ट्रस्ट को क्यों हटाया गया। जबकि वो पक्षकार है। राम मंदिर को जन्मस्थान को मानने वालों ने 500 सालों तक संघर्ष किया। 100 साल पहले बने एक संगठन ने कुछ वर्ष पहले कब्जा कर लिया। कोर्ट ने भी पक्षकारों को दरकिनार कर नया ट्रस्ट बनाने की अनुमति दे दी। जो गलत है। सरकार का काम मंदिर बनाना नहीं है। ये बात सख्त लहजे में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कही।
मध्य प्रदेश के जबलपुर आगमन पर एक चर्चा के दौरान ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अयोध्या राम मंदिर शिलान्यास मामले पर कहा कि साधू-संत, धार्मिक लोग और रामभक्त 500 सालों से इसके लिए संघर्ष करते रहे, लड़ते रहे, ऐसे लोगों को एक राजनीतिक संगठन ने दरकिनार कर दिया। किसी को पूछा तक नहीं। सबके प्रयासों को एक तरफ कर किसी को भी शिलान्यास में नहीं बुलाना और अपनी मनमर्जी करना गलत है।
धर्माचार्यों की अनदेखी की-
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 100 साल भी पूरे नहीं करने वाले राजनीतिक संगठन को कठघरे में खड़ा करते कहा कि एक राजनीतिक परिवार ने धर्म और धर्माचार्यों की अनदेखी की। साधू-संतों और रामभक्तों ने मुकदमा लड़ा, गालियां खाईं, यातनाएं झेलीं और आज शिलान्यास में उनको आमंत्रण तक नहीं है।
मन में टीम तो रहेगी-
शंकराचार्य ने कहा कि शिलान्यास में शंकराचार्य जी महाराज के साथ किसी भी पक्षकार को नहीं बुलाया गया। ऐसी तो परिस्थितियां हैं, ये टीस तो मन में होगी। उन्होंने आगे कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में 40 दिन सुबह से शाम तक बैठकर विशेषज्ञ के रूप में गवाही दी। वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी कई जगहों पर हमारे नाम का उल्लेख है।
हमें ट्रस्टी बनने की पीड़ा नहीं-
शंकराचार्य ने दो टूक कहा कि हमें ट्रस्टी बनने की पीड़ा नहीं है, लेकिन मंदिर बनने के बाद किसके अंडर में रहेगा। सनातन धर्म के हर स्थान पर हमारा अधिकार है और सनानत धर्म के प्रमुख होने की वजह से किसी भी धार्मिक स्थान की जानकारी रखने का स्वत अधिकार है।
नेता राजनीति करें-
विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मौजूदा दौर के नेताओं को लेकर किए गए सवाल पर शंकराचार्य ने सख्त लहजे में कहा कि पुस्तकीय ज्ञान के साथ अनुभव भी हो, तभी आप कुछ कहने-सुनने में सक्षम होते हैं। मौजूदा दौर के नेताओं में न अध्ययन है न अनुभव, फिर आप सनातन के बारे में सिर्फ अपने सियासी लाभ लेने के बोलते हैं। इसलिए नेता सिर्फ राजनीति करें, धर्म का काम धर्माचार्य करें। इसके अलावा उन्होंने कह कि मंदिर बनाना सरकार का काम नहीं। धर्मनिरपेक्ष सरकार मंदिर बनाने का काम न करें।
नेताओं की परीक्षा लें-
चुनावों को देखते हुए जनता को समझाईश देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि निर्बलों को सबल लोग न सताएं, शिक्षा सबको मिले, स्वास्थ्य सबको मिले। इस अवधारणा को लेकर राजनीति का उदय हुआ है। लेकिन अब तो सब उलटा दिखाई देता है। लेकिन जनता नेता से जनता सवाल पूछे और धर्म की बात करने से रोके। यही नहीं जिस तरह स्कूल-कॉलेज में बच्चों की परीक्षाएं होती हैं। उसी तरह नेताओं की भी परीक्षा ली जाए। उन्होंने साफ कहा कि जिम्मेदारी देने से पहले जनप्रतिनिधियों को परखा जाए।
क्या है रामालय ट्रस्ट
छह दिसंबर 1992 को ढांचा ढहाए जाने के बाद 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के प्रयास से द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत 25 धर्माचार्यों ने अयोध्या में जन्मभूमि पर राममंदिर बनाने के लिए रामालय ट्रस्ट का गठन किया था। तब इसके संयोजक जगतगुरू रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य थे। लेकिन करीब तीन दशक लंबे आंदोलन के बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का रास्ता 2019 में तब साफ हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद मंदिर निर्माण की पूरी प्रक्रिया और प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की ज़रूरत पड़ी, तब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के नाम से एक न्यास भारत सरकार ने स्थापित किया गया। जिसका प्रमुख महंत नृत्यगोपाल दास को बनाया गया। इसमें 14 अन्य सदस्यों को भी शामिल किया गया। इस नवगठित न्यास को लेकर रामालय ट्रस्ट के सेक्रेटरी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए किसी नए ट्रस्ट के गठन की जरूरत नहीं है। रामालय ट्रस्ट पहले से है और यह दुनिया का सबसे भव्य मंदिर बनाएगा।
(एबीपी न्यूज संवाददाता अजय त्रिपाठी द्वारा लिए गए एक्सक्यूसिव इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट)


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