पहाड़ जैसा लग रहा एक-एक पल - दा त्रिकाल

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Tuesday, November 28, 2023

पहाड़ जैसा लग रहा एक-एक पल

मतगणना तीन दिसंबर को, अभी पांच दिन शेष, प्रत्याशियों की बेचैनी में हो रहा इजाफा

जबलपुर। 

मतदान के बाद मतगणना के बीच का अंतराल प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ाने वाला साबित हो रहा है। रोज-रोज नए गणित और नए समीकरण सामने आ रहे हैं। कभी खुशी होती है तो कभी गम के बादल छा जाते हैं। हर घंटे एक नया आंकड़ा हवा में लहराता है और बात बदल जाती है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में नई सरकार के इंतजार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। अब मतगणना के लिए मंगलवार से महज पांच दिन बचे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 17 नवंबर को मतदान हो चुका है और तीन नवंबर को परिणाम आएंगे। जबलपुर की आठों विधानसभा सीटों में यदि देखें तो केवल कैंट ही एक ऐसी सीट है,जिस पर स्पष्ट तौर पर कुछ कहा जा रहा है,लेकिन शेष सात पर अभी घुप्प अंधेरा ही है।

-थम गया विकास का पहिया
मतदान और मतगणना के बीच 17 दिन के इंतजार ने भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही उम्मीदवारों की नींद उड़ा दी है। वहीं, जनता भी इस लंबे अंतराल के बीच अगली सरकार बनने का इंतजार कर रही है। इस बार 17 दिन का लंबा अंतराल प्रदेश के कामकाज को भी प्रभावित कर रहा है। क्योंकि आचार संहिता लागू होने के कारण वर्तमान सरकार आमजन से जुड़े विकास कार्य नहीं कर पा रही है। बीमारों की सहायता से जुड़ी सरकारी योजनाओं के रुक जाने से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। आचार संहिता के कारण हर चुनाव में इस तरह की परेशानियां पेश आती हैं।

-बीते चुनाव में कितना था अंतराल
पिछले तीन चुनावों की बात करें तो 12 से 14 दिन का अंतराल रहा है। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में मतदान और मतगणना के बीच 12 दिन का अंतर था। 27 नवंबर को मतदान और आठ दिसंबर को मतगणना हुई थी। इसी तरह वर्ष 2013 में 14 दिन में चुनाव परिणाम आए थे। 25 नवंबर को मतदान और आठ दिसंबर को मतगणना हुई थी। 2018 में भी 14 दिन में मतदान और मतगणना हो गई थी। इस बार 17 दिन का अंतर है। 17 नवंबर को मतदान और तीन दिसंबर को मतगणना होगी।

-जीत की कामना के लिए पूजा-पाठ
मतगणना में 17 दिन के लंबे इंतजार के बीच चुनावी विजय के लिए प्रत्याशी धार्मिक अनुष्ठान करा रहे हैं। प्रत्याशीगण अपने परिवारजनों के साथ ईश्वर की शरण में हैं। इधर, कुछ एक प्रत्याशियों ने ज्योतिषाचार्यों की मदद भी ली है। आचार्यगण भी संभावनाओं और आशंकाओं के साथ प्रत्याशी की शंकाओं का समाधान कर रहे हैं। हालाकि, प्रत्याशी अच्छी तरह जानते हैं कि तीन दिसंबर को मतगणना के पहले इस बेचैनी का और कोई इलाज नहीं है। प्रत्याशियों के परिवार वाले लगातार ढांढस बंधा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि जीत पक्की है,लेकिन प्रत्याशी कहीं न कहीं हार के डर से भी ग्रस्त हैं।

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