दोस्त की दगाबाजी से हुए थे गिरफ्तार, पहचान छिपा कर रहे थे नौकरी
काकोरी कांड का एक सिरा झारखंड के पलामू से भी जुड़ता है। काकोरी कांड के महान क्रांतिकारी अशफाक उल्लाह खां डालटनगंज में दस महीने तक अपनी पहचान छिपाकर नौकरी करते रहे। उस समय जब यह बिहार का हिस्सा था। 26 सितंबर, 1925 की रात जब काकोरी कांड को लेकर पूरे देश में एक साथ गिरफ्तारियां हुईं, तो अशफाक पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए। पहले वह नेपाल गए। कुछ दिन वहां रहकर कानपुर आ गए और गणेशशंकर विद्यार्थी के प्रताप प्रेस में दो दिन रुके। वहां से बनारस होते हुए पलामू आ गए। यहां दस महीने तक रहे। डालटनगंज शहर में उन्होंने मथुरा के लाला जी के रूप में नौकरी कर ली। एक दिन भेद खुल गया तो अशफाक डालटनगंज से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली चले गए और अपने जिले शाहजहांपुर के एक पुराने दोस्त के घर पर ठहरे। लेकिन दोस्त ने दगा कर दी और फिर वे गिरफ्तार कर लिए गए। इसके बाद 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद में इन्हें फांसी दे दी गई। तब इनकी उम्र महज 27 साल थी। पलामू के महावीर वर्मा ने लिखा है, काकोरी षडयंत्र केस का प्रमुख अभियुक्त अशफाक उल्लाह खां ने बहुत दिनों तक पलामू जिला परिषद में काम किया था। वे गुप्त रूप से क्रांतिकारियों के संगठन में व्यस्त रहते थे। उस समय पलामू क्रांतिकारियों का गढ़ था।' यहां रहने के दौरान उन्होंने खुद को मथुरा का कायस्थ बताया था। उन्होंने यहां बांग्ला भाषा भी सीखी थी।-नौ अगस्त का ऐतिहासिक दिन
क्रांतिकारियों ने काकोरी कांड की घटना को अंजाम नौ अगस्त 1925 को दिया था। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ युद्ध में हथियार खरीदने के लिए ट्रेन से ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूटा था। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के दस सदस्यों ने इस घटना को अंजाम दिया था। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के घर आठ अगस्त को हुई आपात बैठक में इसकी योजना बनी थी और अगले ही दिन 9 अगस्त 1925 को हरदोई शहर के रेलवे स्टेशन से सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में बिस्मिल के नेतृत्व में कुल 10 लोग सवार हुए।

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