भाजपा भी उसी रास्ते पर जिस पर इंदिरा गांधी चार दशक पहले चली थीं
भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति पर 1982 में द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का एक कार्टून मुझे याद आया। उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हाथ में छाता लिए पारंपरिक राजनीतिक पोशाक पहने कई राजनेताओं के आगे से गुजर रही थीं। जमीन पर पड़े अखबार की हेडलाइन दृश्य को स्पष्ट करती है, जिसमें लिखा है, आंध्र के सीएम की तलाश जारी है। कार्टून में इंदिरा गांधी को उनमें से किसी एक नेता की ओर उंगली दिखाते और कहते हुए दिखाया गया है कि, ठीक है, आप...वहां... आप सीएम हैं। आपका नाम क्या है? यह कार्टून तब बनाया गया था, जब इंदिरा गांधी ने आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री के लिए एक खोज अभियान चलाया था। दरअसल, उस वक्त राजीव गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अंजैया को सार्वजनिक तौर पर इसलिए अपमानित किया था कि उन्होंने हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर कांग्रेस नेता का असाधारण ढंग से स्वागत किया था। उससे राजीव गांधी इतने नाराज हुए कि उन्होंने दिल्ली लौटकर अपनी मां से अंजैया को बर्खास्त करा दिया। उस घटना की वजह से न केवल कांग्रेस ने कम पहचान वाले मुख्यमंत्रियों को नियुक्त करना शुरू किया, बल्कि उससे तेलुगू स्वाभिमान आंदोलन भी शुरू हुआ, जिसमें एनटी रामाराव एक नेता के तौर पर उभरे और आखिरकार 1983 में उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के लिए तेलुगू देशम पार्टी का गठन किया। शीघ्र फैसले लेने के लिए जानी जाने वाली भाजपा ने तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के एलान करने में काफी समय लगाया। आखिरकार जब मुख्यमंत्रियों और उनके दो उप मुख्यमंत्रियों के नाम सामने आए, तो कम ही लोग थे, जिन्होंने कभी मोहन यादव, भजन लाल शर्मा या विष्णु देव साय का नाम सुना था। टेलीविजन पर यह खबर देखने के बाद गूगल पर इनके नामों की खूब खोज की गई। इनके अलावा, राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवडा, दीया कुमारी, प्रेम चंद बैरवा, विजय शर्मा और अरुण साव के नामों के साथ भी यही हुआ, जो सभी इन तीनों राज्यों के अनाम से नेता हैं। हैरत की बात है कि भाजपा ने भी उसी रास्ते का अनुसरण किया है, जो इंदिरा गांधी ने चार दशक पहले चुना था। इतिहास गवाह है कि यह इंदिरा गांधी के सत्तावादी तरीकों की अभिव्यक्ति थी, लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह कदम उठाकर पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं और आम जनता को क्या संदेश दिया है? इस सवाल का जवाब देने से पहले मुझे एक और घटना याद आती है। बात दरअसल 2014 की है, जब लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, जिनकी मेरी लिखी जीवनी उस वक्त काफी चर्चित हुई थी। तब कई पत्रकारों ने इंटरव्यू वगैरह के लिए मुझसे संपर्क भी किया। इनमें से एक पत्रकार ने मुझसे हुई बातचीत के आधार पर अपनी पत्रिका के कवर पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ मेरे नाम के साथ मेरी टिप्पणी प्रकाशित की, कि मोदी कभी भूलते या माफ नहीं करते। नरेंद्र मोदी के बारे में ऐसी बात कहने वाले कम नहीं हैं। दुनिया व भारत में भी ऐसे और भी नेता होंगे, जिनके बारे में यह बात कही जा सकती हो। लेकिन आज जबकि शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे की पारी खत्म हो गई है, मुझे प्रधानमंत्री की यही खूबी याद आ रही है। एक स्तर पर देखें तो यह फैसले बिल्कुल निजी दिखते हैं। यह 2011-12 और 2013 की शुरुआत में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची में मोदी को चुनौती देने के चौहान और राजे के फैसले पर मोदी का प्रतिशोध भी हो सकता है।
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