पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास पर अफसरों ने लगाया पलीता
भोपाल गैस त्रासदी के मामले में आने वाली 16 तारीख बेहद अहम है। हाईकोर्ट में इस तारीख की सुनवाई में ये तय हो जाएगा कि अवमानना के दोषी अधिकारियों को सजा मिलेगी या राहत। न्यायाधीशों का रुख देखकर भोपाल में बैठे अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है,क्योंकि मामला बेहद संवेदनशील है,लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया।भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास संबंधी आदेश का पालन नहीं करने के मामले में अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के दो अधिकारी अवमानना के आरोप में घिरे हैं। इन अधिकारियों ने अवमानना के आरोपों के खिलाफ कोर्ट में आवेदन दिया है। कोर्ट इस पर अगली सुनवाई के दौरान विचार करेगी। हाई कोर्ट के जस्टिस शील नागू और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ के समक्ष अवमानना मामले की सुनवाई हो रही है। न्यायमित्र नमन नागरथ ने कोर्ट को बताया कि मॉनिटरिंग कमेटी के वकील को सरकार स्वीकृति नहीं दे रही है। उन्होंने दलील दी कि कमेटी सरकार के अधीन नहीं है।
-ऐसे समझें पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन सहित अन्य की याचिका की सुनवाई की थी। गैस पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास के संबंध में 20 निर्देश दिए थे। इनका क्रियान्वयन सुनिश्चित कर मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने के आदेश दिए थे। इस कमेटी को हर तीन माह में अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने पेश करने को कहा था। साथ ही रिपोर्ट के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाने थे। मॉनिटरिंग कमेटी की अनुशंसाओं पर कोई काम नहीं होने का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दाखिल की थी। अवमानना याचिका में कहा गया कि गैस पीड़ितों के हेल्थ कार्ड तक नहीं बने हैं। अस्पतालों में आवश्यकता अनुसार उपकरण व दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। बीएमएचआरसी के भर्ती नियम तय नहीं होने से डॉक्टर व पैरामेडिकल स्टाफ स्थाई तौर पर सेवाएं प्रदान नहीं कर रहे हैं। इस कारण पीड़ितों को उपचार के लिए भटकना पड़ रहा है। पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट की युगल पीठ ने कहा था कि कम्प्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र की थी।

No comments:
Post a Comment