गुरुवर के आलोक से आलोकित रहेगी संस्कारधानी - दा त्रिकाल

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Sunday, February 18, 2024

गुरुवर के आलोक से आलोकित रहेगी संस्कारधानी


आचार्य विद्यासागरजी हुये समाधिस्थ, शोक की लहर, संस्कारधानी को प्राप्त था गुरुवर का आध्यात्मिक सानिध्य,अंतिम दर्शन के लिए जबलपुर से रवाना हुए श्रद्धालु

विश्ववंदनीय संत आचार्य गुरुवर श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के समाधिस्थ होने की सूचना से हर तरफ शोक की लहर है। आचार्यजी महाराज और संस्कारधानी के बीच आध्यात्मिक रिश्ता रहा है। समस्त संस्कारधानी ने आचार्यजी के सानिध्य में सांस्कृतिक व आध्यात्मिक र्प्रगति के नए आयाम तय किए हैं। आचार्यश्री ेके प्रस्थान से प्रत्येक जन शोकाकुल है। ये शोक की हृदयविदारक घड़ी है,क्योंकि अपनी अलौकिक मुस्कान से लोगों के जीवन की निराशा और अवसाद को हर लेने वाले परमपूज्य गुरुवर अब हमारे मध्य नहीं रहे, उनकी कमी सदैव खलेगी पर ये भी नितांत सत्य है कि उनका आलोक सदैव हमारे साथ रहेगा। आचार्य श्री विद्यासागर द्वारा दिए गये सामाजिक संदेशों से सदियों तक मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।

- अनंत में समा गई दिव्य ज्योति

छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चन्द्रगिरी तीर्थ पर उन्होंने अंतिम सांस ली है। उनका अंतिम संस्कार आज 18 फरवरी, रविवार को दोपहर 1 बजे किया जाएगा। उनके अंतिम दर्शन के लिए जबलपुर से भी लोग रवाना हो चुके हैं। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने रात 2.30 बजे संल्लेखना पूर्वक समाधि (देह त्याग)ली है। आचार्यश्री पिछले कुछ दिन से अस्वस्थ थे। पिछले तीन दिन से उन्होंने अन्न जल का पूरी तरह त्याग कर दिया था। आचार्यश्री अंतिम सांस तक चैतन्य अवस्था में रहे और मंत्रोच्चार करते हुए उन्होंने देह का त्याग किया है।
 

-तप और त्याग की महामूर्ति

आपका जन्म 10 अक्टूबर 1946 को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगाँव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता श्री मल्लप्पा थे जो बाद में मुनि मल्लिसागर बने। उनकी माता श्रीमंती थी जो बाद में आर्यिका समयमति बनी। विद्यासागर जी को 30 जून 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी जो आचार्य शांतिसागर शिष्य थे। आचार्य विद्यासागर जी को 22 नवम्बर 1972 में ज्ञानसागर जी द्वारा आचार्य पद दिया गया था। सभी घर के लोग संन्यास ले चुके है। उनके भाई महावीर, अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की और मुनि योगसागर जी और मुनि समयसागर जी मुनि उत्कृष्ट सागर जी कहलाये। आचार्य विद्यासागर जी संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न आधुनिक भाषाओं हिन्दी, मराठी और कन्नड़ में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत के विशाल मात्रा में रचनाएँ की हैं। सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है।उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परीषह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं। उन्होंने काव्य मूक माटी की भी रचना की है। विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है।आचार्य विद्यासागर जी कई धार्मिक कार्यों में प्रेरणास्रोत रहे हैं। आचार्य विद्यासागर जी के शिष्य मुनि क्षमासागर जी ने उन पर आत्मान्वेषी नामक जीवनी लिखी है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है। मुनि प्रणम्यसागर जी ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है।

जानिए आचार्य श्री महाराज को-


-कोई बैंक खाता नही कोई ट्रस्ट नही, कोई जेब नहीं, कोई मोह माया नहीं, अरबों रुपये जिनके ऊपर निछावर होते हैं उन गुरुदेव के कभी धन को स्पर्श नहीं किया।

-आजीवन चीनी का त्याग

-आजीवन नमक का त्याग

-आजीवन चटाई का त्याग

-आजीवन हरी सब्जी का त्याग, फल का त्याग, अंग्रेजी औषधि का त्याग, सीमित ग्रास भोजन, सीमित अंजुली जल, 24 घण्टे में एक बार 365 दिन

-आजीवन दही का त्याग

-सूखे मेवा का त्याग

-आजीवन तेल का त्याग,

-सभी प्रकार के भौतिक साधनो का त्याग

-एक करवट में शयन बिना चादर, गद्दे, तकिए के सिर्फ तखत पर किसी भी मौसम में

-पूरे भारत में सबसे ज्यादा दीक्षा देने वाले

-एक ऐसे संत जो सभी धर्मो में पूजनीय

-शहर से दूर खुले मैदानों में नदी के किनारो पर या पहाड़ों पर अपनी साधना करना



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