बात पुरानी है लेकिन काम की है। वर्ष 1993 मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने वाली थी। मुख्यमंत्री कौन हो इस पर चर्चा करने के लिए दिल्ली के 20 केनिंग लेन बंगले में प्रदेश के कांग्रेस नेता अर्जुनसिंह, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और अजित जोगी बैठे थे। सबसे ज्यादा उत्साहित कमलनाथ ही थे। मुख्यमंत्री बनने की लालसा उछाल मार रही थी। जीन्स और लाल टी शर्ट पहने कमलनाथ अपने अंदाज में कम नेताओं की अति महत्वपूर्ण बैठक में अपने को मुख्यमंत्री बनता देख रहे थे। वे बोल ही पड़े की कांग्रेस के पास पर्याप्त बहुमत है, अब मुझे सीएम बनने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। मैं भी बनने के लिए तैयार हूं। ये सुनकर दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी सन्न रह गए। लेकिन प्रदेश के असल चाणक्य ने बहुत ही निर्विकार भाव से ये बात सुनी, कमलनाथ की तरफ देखा। फिर जो कहा वो सुनकर उनका पूरा जोश हवा में उड़ गया।
अर्जुनसिंह ने कहा कि कांग्रेस को खासा बहुमत है, ये सही है। लेकिन प्रदेश की जनता आपको ष्टरू स्वीकार नहीं करेगी। ये सुनते ही सभी चुप हो गए। थोड़ी देर बाद कमलनाथ ही बोले ऐसा नहीं है। तब अर्जुनसिंह ने कहा रायशुमारी करा लें, सच सामने आ जायेगा। कमलनाथ कृपा की राजनीति करते रहे इसलिए रायशुमारी करने की हिम्मत न जुटा पाए। दूसरे वो नेताओं के नेता ही हैं, जननेता नहीं।
आज ये बात याद आने का कारण भी है। उनके बीजेपी में जाने की खबर। पुत्र नकुलनाथ के चुनाव की सुरक्षित गारंटी। कमलनाथ बड़े नेता हैं ये सही है, लेकिन राजनीति की ऊंच नीच से बहुत निराश हो जाते हैं। आत्मविश्वास डगमग ही रहता है। पैसे से राजनीति साधने की हिकमत अब काम नहीं आती। इन्ही बातों के चलते कमलनाथ ने राजनीति के बंकर में शरण लेने को समाधान मान लिया है।
एक बात जो छिंदवाड़ा लोकसभा सीट और जिले को लेकर कह देना ठीक होगा कि इसका प्रतिनिधित्व 1980 से भले ही कमलनाथ कर रहे हों। आज़ादी के बाद से अब तक कांग्रेस की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली इस सीट और जिले में कांग्रेस कमजोर ही हुई है। एक उपचुनाव हार कर कमलनाथ ने हार का कलंक भी लगाया है। अलकनाथ का इस्तीफा और उपचुनाव ये भी उनकी कमजोर राजनीतिक सोच समझ का उदाहरण है।
वो बीजेपी में जाएं न जाएं ये उनका निजी मसला है। लेकिन राजनीतिक नजर से इसके जो मायने निकलेंगे उनका इंतजार है।
काशीनाथ
द त्रिकाल मीडिया

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